आज पुनः रोहिंग्या मुस्लिम का इतिहास जनाने की ज़रूरत है । कॉमन ईरा (सीई) के वर्ष 1400 के आसपास ये लोग ऐसे पहले मुस्लिम्स हैं जो कि बर्मा के अराकान प्रांत में आकर बस गए थे। इनमें से बहुत से लोग 1430 में अराकान पर शासन करने वाले बौद्ध राजा नारामीखला (बर्मीज में मिन सा मुन) के राज दरबार में नौकर थे। इस राजा ने मुस्लिम सलाहकारों और दरबारियों को अपनी राजधानी में प्रश्रय दिया था। अराकान म्यांमार की पश्चिमी सीमा पर है और यह आज के बांग्लादेश (जो कि पूर्व में बंगाल का एक हिस्सा था) की सीमा के पास है। इस समय के बाद अराकान के राजाओं ने खुद को मुगल शासकों की तरह समझना शुरू किया। ये लोग अपनी सेना में मुस्लिम पदवियों का उपयोग करते थे। इनके दरबार के अधिकारियों ने नाम भी मुस्लिम शासकों के दरबारों की तर्ज पर रखे गए। परंतु इस भरोसे के बाद भी ये रोहिंग्या मुस्लिम अपनी हरकतों से संदेही बने रहे ।
बौद्ध नागरिकों के खिलाफ उठा सकते हैं हिंसक कदम रोहिंग्या समुदाय के खिलाफ म्यांमार में शुरू हुई सैन्य कार्रवाई की वजह से सैकड़ों-हजारों महिलाओं, बच्चों और पुरुषों को अपने घर छोड़ने को मजबूर होना पड़ा है। ऐसे में केंद्र ने एक आशंका यह भी जताई कि ये रोहिंग्या देश में रहने वाले बौद्ध नागरिकों के खिलाफ हिंसक कदम उठा सकते हैं।
केंद्र ने यह भी चिंता जताई कि अवैध शरणार्थियों की वजह से कुछ जगहों पर आबादी का अनुपात गड़बड़ हो सकता है। ऐसे में वे रोहिंग्या शरणार्थी जिनके पास संयुक्त राष्ट्र के दस्तावेज नहीं हैं, उन्हें भारत से जाना ही होगा।
भारत में आधिकारिक रूप से 40 हजार रोहिंग्या
भारत में पनाह लेकर रहने वाले रोहिंग्या शरणार्थियों को देश से निकालने की मांग हमेशा से होती रही है। हालांकि, 2017 में तत्कालीन केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री किरण रिजूजू ने आधिकारिक रुप से रोहिंग्याओं की संख्या 40,000 बताई थी। उन्होंने यह भी बताया कि इनमें लगभग 16,000 औपचारिक रूप से यूएनएचसीआर से शरणार्थी के रूप में पंजीकृत थे। हालांकि वर्तमान में रोहिंग्या प्रवासियों की सटीक संख्या का पता लगाना मुश्किल है। वैसे तो अब तक यह आंकड़ा काफी बढ़ गया होगा। अब भारत सरकार के सामने रोंहिग्या मुस्लिमों की रोजी-रोटी से कहीं बड़ा सवाल देश की सुरक्षा का है। दरअसल सरकार को ऐसे खुफिया इनपुट मिले हैं कि पाकिस्तान से ऑपरेट कर रहे टेरर ग्रुप इन्हें अपने चंगुल में लेने की साजिश में लग गए हैं। रोहिंग्या मुसलमान आईएसआई और आईएसआईएस के भी संपर्क में हैं। ऐसे में इनका भारत में रहना देश के लिए खतरा है।
रोहिंग्या देश की सुरक्षा के लिए खतरा
वैध रोहिंग्या प्रवासियों को देश की सुरक्षा के लिए खतरा करार दिया गया है। यह भी बताया गया है कि ये अवैध गतिविधियों में शामिल हैं। सरकार ने कहा है कि रोहिंग्या समेत तमाम अवैध प्रवासी देश की सुरक्षा के लिए खतरा हैं। उनके अवैध गतिविधियों में शामिल होने की रिपोर्ट भी मिली है। कांग्रेस, टीएमसी, लेफ्ट, एआईएआईएम, समाजवादी पार्टी और आरजेडी जैसे राजनीतिक दल रोहिंग्या मुसलमानों को वोट बैंक की नजर से देख रहे हैं। जबकि भारत सरकार का मानना है कि रोहिंग्या घुसपैठिये देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा हैं। कट्टरपंथी इस्लाम से भी इनका निकट संबंध माना जाता है।
सोची समझी साजिश है रोहिंग्या को बसाना !
भारत में घुस आए रोहिंग्या मुसलमानों को वापस भेजना इसलिये भी जरूरी है कि ये लोग म्यांमार में हिंसा के दौरान वहां से भाग कर नहीं बल्कि साजिश के तहत पिछले एक दशक के दौरान आए हैं। शंका इसलिए भी उठ रही है कि असम और बंगाल के शरणार्थी कैंपों को छोड़कर इतनी दूर ये जम्मू कश्मीर कैसे आ गए? जम्मू में रोहिंग्या मुसलमानों के बसाने के पीछे क्या मकसद है? कौन सी संस्थाएं हैं जो वहां सेटल करा रही हैं? जाहिर है इसमें किसी बड़ी साजिश की बू आ रही है। जम्मू और सांबा में बड़ी संख्या में रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठिये बसे हुए हैं। ये लोग राजीव नगर, कासिम नगर, नरवाल, भंठिड़ी, बोहड़ी, छन्नी हिम्मत, नगरोटा और अन्य क्षेत्रों में बड़ी तादाद में हैं। दरअसल इन क्षेत्रों के भौगोलिक और जनसांख्यिकीय बदलाव के लिए ही इन्हें बसाने की साजिश रची गई है। गौरतलब है कि 2010 से लेकर अब तक रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों की संख्या में करीब चार गुना बढ़ोतरी दर्ज की गई है। दरअसल यह हिंदू बहुल ‘जम्मू संभाग की जनसांख्यिकी को बदलने’ की साजिश का परिणाम है। इस साजिश के तहत बांग्लादेशी घुसपैठियों और घाटी के मुसलमानों को भी जम्मू में बसाया गया। उन्हें रोशनी एक्ट की आड़ में भूमि आवंटित की गई और मतदाता बनाया गया, ताकि चुनावी समीकरणों को प्रभावित किया जा सके। रोहिंग्या घुसपैठियों को राजनीतिक प्रश्रय देकर बंगाल में भी बड़ी संख्या में बसाया गया।
म्यांमार में हिंदुओं के सामूहिक नरसंहार में शामिल रहे रोहिंग्या
एमनेस्टी इंटरनेशनल की जांच के अनुसार, रोहिंग्या मुसलमान आतंकवादियों ने 2017 के अगस्त में म्यांमार के सैकड़ों हिंदू नागरिकों की सामूहिक हत्या की थी। इस नरसंहार को ‘आरसा’ नाम के संगठन ने अंजाम दिया था, जिसने 99 निर्दोष लोगों को क्रूर तरीके से मौत के घाट उतार दिया था। रिपोर्ट के अनुसार 26 अगस्त, 2017 को ‘आरसा’ के आतंकवादियों ने म्यामांर में रखाइन प्रांत के ‘अह नौक खा मौंग सेक’ गांव के सभी पुरुषों को सामूहिक तौर पर मार दिया और महिलाओं को बंदी बना लिया था। बच्चों के सामने ही उनके परिजनों की सामूहिक हत्या की गई और बाद में उन्हें सामूहिक कब्र में दफना दिया गया।
भारत में घुसपैठियों को मुस्लिम देशों से की जाती है हवाला फंडिंग
जांच में यह बात भी सामने आई है कि इन घुसपैठियों को भारत में बसाने के लिए पाकिस्तान, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब आदि मुस्लिम देशों से हवाला फंडिंग की जा रही है। हवाला फंडिंग से खाए-अघाए कुछ एनजीओ, मदरसे, वेलफेयर सेंटर आदि बनाने/ चलाने की आड़ में इनकी सुगम बसावट सुनिश्चित कर रहे थे और जरूरी दस्तावेज जुटाने/ बनवाने में भी इनकी मदद कर रहे थे। भारत की खुफिया एजेंसियां अब इनको उघाड़ने में जुटी हुई हैं।
वैसे तो रोहिंग्या मुसलमानों का मुद्दा पूरी दुनिया में छाया हुआ है लेकिन आजकल एक बेहद अजीब खबर उनके बारे में प्रचारित की जा रही है जिसमे उन्हें मानव मांस खाने वाला बताया जा रहा है. आज कोहराम न्यूज़ इसी खबर की पड़ताल करके आपके सामने रखेगा की यह खबर सच है या झूठ, क्या सच में रोहिंग्या मुसलमान इंसानी मांस खाकर अपनी भूख मिटाते है, क्या सच में बर्मा सरकार उन्हें इसीलिए देश से निकाल रही है क्योंकी उन्होंने वहां के बौधों को खाकर उनकी आबादी कम आकर दी और अब उन्हें भगाया जा रहा है. क्या दुनिया का कोई भी देश उन्हें इसीलिए पनाह नही दे रहा है क्योंकी उन्हें दर है की रोहिंग्या मुसलमान उनके बच्चो को खा जायेंगे.
वैसे आपको सुनने में यह बाते बेहद अजीब सी लग सकती है लेकिन ऐसी खबर सोशल मीडिया पर बड़ी तादात में वायरल की जा रही है की रोहिंग्या मुसलमान इंसानी मांस खाते है. वायरल की जा रही इन पोस्टों में कुछ फोटो लगाकर लिखा गया है की वैसे तो इस तरह की काफी पोस्ट वायरल की जा रही है जहाँ अलग अलग लोग भिन्न फोटो का इस्तेमाल करके यह साबित करने की कोशिश कर रहे है की रोहिंग्या मुसलमान इंसानी भक्षक है और उन्हें म्यांमार से इसी कारण भगाया जा रहा है.
आइये देखते है आखिर क्या सच है. इसमें जो फोटो इस्तेमाल किये गये है उनकी पड़ताल करते है.
इस वायरल मैसेज में एक फोटो इस्तेमाल किया गया हैे जिसमे इंसानी सिर दीवार के साहारे रखे गये है लेकिन आपको बताते चले की यह फोटो कम्पलीट नही है इस फोटो में गत्ते के एक टुकड़े पर सन्देश भी लिखा गया है जो सिरों के ठीक सामने है चूँकि उसपर साफ़ पढ़ा जा सकता है की यह फोटो ड्रग माफियाओं से सम्बंधित है इसीलिए उस सन्देश को बड़ी चालाकी से फोटोशॉप से कट कर दिया गया है. दरअसल इसमें जो लोग दिखाए गये है वो मक्सिको की जेल में हुई हिंसाओ में मारे गये थे और इन सभी का सम्बन्ध ड्रग माफिया गैंग से था. ना तो इनमे से किसी का सम्बन्ध रोहिंग्या से है और ना ही इनकी गर्दन इसलिए काटी गयी है की इन्हें पकाकर खाया जाए. लिंक देखें – :
http://www.borderlandbeat.com/2012/03/10-decapitated-heads-found-at.html
इसके बाद जो दूसरी फोटो इस मैसेज में दिखाई गयी है जिसमे साफ़ तौर पर देखा जा सकता है की कुछ लोग मानव शरीर को काट रहे है, दरअसल उस फोटो का सम्बन्ध थाईलैंड से है और यह मुसलमानों के बिलकुल विपरीत बौधों की एक प्रकार की धार्मिक क्रिया होती है जिसका नाम “Lang Pa Cha’ (लैंग पा चा), इस धार्मिक रिवाज के तहत जंगल की सफाई की जाती है अगर ऐसे में कोई अनजान मृत शरीर मिलता है तो उसके शरीर की एक-एक हड्डी को अलग करके साफ़ किया जाता है, जिसके लिए स्वंसेवक साथ रखे जाते है और पूरी प्रक्रिया मेडिकल स्टाफ की देख रेख में होती है. लिंक पर क्लिक करके आपको खुद सच का अंदाज़ा आ जायेगा
https://www.documentingreality.com/forum/f10/field-dressing-man-23186/.
सन 2009 में जब यह फोटो दुनिया के सामने आई थी तब इन्होने तहलका मचा दिया था. काफी लोगो ने थाईलैंड एम्बेसी को ईमेल के ज़रिये इन फोटोग्राफ की सच्चाई बताने के आग्रह किया और एक तरह की मुहीम चल पड़ी जिसे ‘मेतहुलु’ कहा गया. बाद में इनकी असलियत सामने आई थी की थाईलैंड के एक इलाके प्रन्चुबखीरी जगह के बौध लोग इस तरह की रीति रिवाज का पालन करते है. इसमें उन शरीर को साफ़ किया जाता है जो लावारिस अवस्था में मिलते है और उन्हें काट कर उनकी हड्डियाँ निकाल ली जाती है फिर उन्हें दफ़न किया जाता है. इस लिंक पर पूरी डिटेल पढ़ी जा सकती है – http://www.snopes.com/photos/gruesome/thaicannibals.asp